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सोने का कलश और मिट्टी का घड़ा - बच्चों की नैतिक कहानी

क्या बाहरी सुंदरता ही सब कुछ है? पढ़िए 'रूप बड़ा या गुण' पर आधारित यह शिक्षाप्रद कहानी, जहाँ एक समझदार ऋषि ने सोने के कलश और मिट्टी के घड़े के उदाहरण से जीवन का असली सच समझाया।

By Lotpot
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सोने का कलश और मिट्टी का घड़ा :- प्राचीन समय की बात है, भारत के एक समृद्ध नगर 'चंदनपुर' में एक प्रतिष्ठित जमींदार रहते थे, जिनका नाम था 'प्रताप सिंह'। प्रताप सिंह न केवल धनवान थे, बल्कि बहुत बुद्धिमान भी थे। उनकी एक बेटी थी, 'अवनि', जो बेहद खूबसूरत थी। अवनि को अपनी सुंदरता और राजसी ठाठ-बाट पर थोड़ा गर्व था। जब अवनि विवाह योग्य हुई, तो प्रताप सिंह ने उसके लिए एक योग्य वर की तलाश शुरू की।

अवनि चाहती थी कि उसका पति दिखने में राजकुमार जैसा सुंदर हो। वहीं, प्रताप सिंह चाहते थे कि लड़का गुणवान और समझदार हो, चाहे वह साधारण ही क्यों न दिखता हो।

दो दावेदार: रजत और मोहन

काफी खोजबीन के बाद दो रिश्ते सामने आए। पहला युवक था 'रजत'। वह शहर के सबसे अमीर व्यापारी का बेटा था। रजत दिखने में बेहद आकर्षक था, हमेशा कीमती रेशमी कपड़े पहनता और इत्र की खुशबू में महकता रहता था। उसे देखकर कोई भी मोहित हो सकता था। दूसरा युवक था 'मोहन'। वह एक साधारण किसान परिवार से था। मोहन का रंग सांवला था और वह सादे सूती कपड़े पहनता था। लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर शांति थी। वह अपने गांव में अपनी सेवा-भाव और मेहनत के लिए जाना जाता था।

अवनि ने जब दोनों को देखा, तो उसने तुरंत रजत को पसंद कर लिया। उसने अपने पिता से कहा, "पिताजी, रजत कितना सुंदर और प्रभावशाली है। मोहन तो उसके सामने नौकर जैसा लगता है। रूप बड़ा होता है, मुझे रजत ही चाहिए।" प्रताप सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटी, जीवन साथी चुनना गुड़ियों का खेल नहीं है। निर्णय लेने से पहले हमें हमारे कुलगुरु, महर्षि वेदव्यास जी की सलाह लेनी चाहिए।"

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ऋषि की परीक्षा

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अगले दिन प्रताप सिंह, अवनि, रजत और मोहन को लेकर नगर के बाहर पहाड़ी पर स्थित महर्षि के आश्रम गए। महर्षि वेदव्यास जी अपनी कुटिया के बाहर ध्यान मग्न थे। ज्येष्ठ का महीना था और सूरज आग बरसा रहा था। गर्मी के कारण सबका गला सूख रहा था। प्रताप सिंह ने महर्षि को प्रणाम किया और अपनी दुविधा बताई। महर्षि ने अवनि की ओर देखा और बोले, "पुत्री, तुम्हारा प्रश्न है कि रूप बड़ा या गुण? इसका उत्तर तुम्हें आज शाम तक मिल जाएगा। लेकिन उससे पहले, मुझे बहुत प्यास लगी है। क्या तुम इन दोनों युवकों के साथ जाकर पास के झरने से मेरे लिए पानी ला सकती हो?"

महर्षि ने रजत को एक सुंदर नक्काशीदार सोने का कलश (Golden Pot) दिया और मोहन को एक साधारण काली मिट्टी का घड़ा (Earthen Pot) दिया। महर्षि ने कहा, "झरना यहाँ से दो कोस दूर है। जाओ और पानी भरकर लाओ।"

सफर और सूरज का प्रकोप

रजत ने सोने के कलश को बड़े गर्व से पकड़ा। उसे लगा कि सोने का कलश उसकी शान के खिलाफ नहीं है। वह अवनि को प्रभावित करने के लिए तेज चाल से चला। मोहन चुपचाप अपना मिट्टी का घड़ा लेकर उनके पीछे हो लिया। झरने पर पहुँचकर दोनों ने अपने-अपने बर्तन भरे। वापसी का रास्ता कठिन था। दोपहर का सूरज सिर पर था। तपती धूप में सोने का कलश बहुत जल्दी गर्म होने लगा। रजत के हाथ जलने लगे, लेकिन शान बनाए रखने के लिए उसने कलश को नहीं छोड़ा। गर्म धातु के संपर्क में आने से अंदर का पानी भी उबलने लगा।

दूसरी ओर, मोहन ने अपने मिट्टी के घड़े को गीले कपड़े से ढक रखा था। मिट्टी की तासीर ठंडी होती है और बाहरी गर्मी का असर पानी पर नहीं हो रहा था। मोहन बड़े आराम से चल रहा था।

प्यास और असली पहचान

जब वे आश्रम वापस पहुँचे, तो महर्षि प्यास से बेहाल थे। अवनि ने उत्साह से कहा, "गुरुवर, रजत पहले आया है, आप इसके सोने के कलश का पानी पीजिए।" महर्षि ने जैसे ही सोने के कलश को होठों से लगाया, वे झटके से पीछे हट गए। पानी इतना गर्म था कि उनका मुंह जल गया। "यह तो आग जैसा गर्म है! क्या तुम मुझे जलाना चाहते हो?" महर्षि क्रोधित नहीं, बल्कि पीड़ा में बोले। रजत शर्मिंदा हो गया। उसका सुंदर कलश प्यास बुझाने में असमर्थ था।

फिर महर्षि ने मोहन को इशारा किया। मोहन ने आगे बढ़कर मिट्टी के घड़े से पानी एक कटोरे में डाला और महर्षि को दिया। पानी शीतल और अमृत जैसा मीठा था। महर्षि ने तृप्त होकर पानी पिया और आशीर्वाद दिया। "आह! आत्मा तृप्त हो गई।"

अवनि की आँखें खुलीं

महर्षि ने अवनि को पास बुलाया और समझाया, "पुत्री, देखो! यह सोने का कलश देखने में कितना सुंदर और चमकदार है, इसका 'रूप' बहुत बड़ा है। लेकिन मुसीबत के समय (गर्मी में) इसने अपना धर्म नहीं निभाया, पानी को गर्म कर दिया जो पीने योग्य नहीं रहा। वहीं, यह मिट्टी का घड़ा दिखने में काला और खुरदरा है, इसमें कोई चमक नहीं। लेकिन इसका 'गुण' देखो - इसने आग बरसते सूरज में भी पानी को शीतल रखा और मेरी प्यास बुझाई।"

महर्षि ने आगे कहा, "हिंदी कहानियां हमें यही सिखाती हैं कि रूप (सौंदर्य) केवल आँखों को अच्छा लगता है और समय के साथ ढल जाता है, जैसे सोने का कलश गर्म हो गया। लेकिन गुण (स्वभाव और कर्म) आत्मा को सुख देते हैं और कठिन समय में साथ निभाते हैं, जैसे मिट्टी का घड़ा।"

अवनि को अपनी गलती का अहसास हो गया। उसने देखा कि रजत का चेहरा पसीने से खराब हो गया था और वह झुंझला रहा था, जबकि मोहन अभी भी शांत और विनम्र खड़ा था। अवनि ने समझ लिया कि जीवन बिताने के लिए बाहरी चमक नहीं, बल्कि आंतरिक शीतलता और गुण चाहिए।

अवनि ने अपने पिता से कहा, "पिताजी, मुझे क्षमा करें। मैं सोने की चमक में पीतल और सोने का फर्क भूल गई थी। मुझे अब समझ आ गया है कि रूप से बड़ा गुण होता है। मैं मोहन को अपना जीवनसाथी चुनती हूँ।" प्रताप सिंह ने गर्व से अपनी बेटी को गले लगा लिया।

इस कहानी से सीख (Moral of the Story):

  1. बाहरी दिखावा छलावा है: सुंदरता और महंगे कपड़े इंसान के स्वभाव को नहीं बदल सकते।

  2. गुण ही असली धन है: कठिन परिस्थितियों में इंसान का रूप नहीं, बल्कि उसके गुण और व्यवहार ही काम आते हैं।

  3. उपयोगिता का महत्व: कोई चीज कितनी भी सुंदर क्यों न हो, अगर वह उपयोगी नहीं है, तो उसका कोई महत्व नहीं। 

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